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Thursday, May 9, 2019

kaise kaam kerta hai internet


कैसे काम करता है इंटरनेट

एक पुरानी कहावत है कि गाड़ी चलाने के लिए मैकेनिक होना जरूरी नहीं  होता है। लेकिन अगर आप गाड़ी के कुछ तकनीकी पहलुओं को जानते हों, गाड़ी के मैकेनिकल पार्ट औऱ उनके फंक्शन को समझते हों तो ड्राइविंग ज्यादा बेहतर हो सकती है।


 बिल्कुल यही बात इंटरनेट यूजर्स पर भी लागू होती है। नेट यूज करने के लिए उसकी तकनीक से वाकिफ होना जरूरी नहीं है, लेकिन अगर आप थोड़ी बहुत तकनीक जानते हैं तो इंटरनेट का इस्तेमाल आपके लिए ज्यादा आसान हो जाएगा औऱ साथ ही नेट का अनुभव भी आपके लिे बदल जाएगा। जब आप नेट के बारे में जानेगें तो उससे जुडी शब्दीवली भी आपके सामने आएगी औऱ उससे एक नया संसार आपके सामने खुलेगा।

सबसे पहले तो यह बुनियादी बात आपको पता होनी चाहिए कि इंटरनेट कंप्यूटरों का एक वैश्विक नेटवर्क है। यानी आप इंटरनेट यूूज कररहे है तो आपका कंप्यूटर अपने आप आपके पड़ोसी, दोस्तो औऱ रिश्तेदारों से जुडा हुआ है। आफ बना कुछ किए गूगल, याहू से लेकर अफने दफ्तर के कंप्यूटर तक से जुडे होते है


आपका कंप्यूटर अपने आप दूसरे कंप्यूटरों से अपनी भाषा में बात करता रहता है। इनकी एक अलग साझा औऱ खास ढंग से विकसित की गई भाषा होती है। यू तो इंटरनेट की खोज 1960 के दशक  में हो गई थी। लेकिन तब इसका इस्तेमाल कुछ खास जगहों पर मिलिट्री औऱ एकडमिक संस्थाओं के आपसी नेटवर्क के लिए होता था। आधुनिक इंटरनेट की शुरूआथ करीब 20 साल पहले हुई है। करीब 20 साल पहले एक वैज्ञानिक ने अपने दस्तावेज के प्रेजेंटेशन के लिए हाइपरलिंक्स का इस्तेमाल किया था, उसे ही आज हम वल्ड वाइड वेब (WWW - WORLD WIDE WEB) नाम से जानते है।


दुनिया भर के अरबों कंप्यूटर जो आपस में जुडे होते है, उनका नेटवर्क बुनियादी रूप से केबल के जरिए जुड़ा होता है। यह किसी भी केबल से जुडा हो सकता है। चाहे आपके घर में लगा टेलीफोन का केबल हो या प्रकाश की गति से डाटा ट्रांसफर करने वाला आँप्टिक फाइबर केबल हो, सब आपके कंप्यटूर को दूसरे कंप्यूटर से कनेक्ट करते हैं। 


ज्यादातर लोग, जो इंटरनेट से जुडे होते है उनके इस जुडाव का जरिया एसिनक्रोनस डिजिटल सब्सक्राइबर लाइन यानी एडीएसएल होता है। आमतौर पर इस किस्म के कनेक्शन को ब्राॅडबैंड के नाम से जाना जाता है। आपका कंप्यूटर एक ब्राॅडबैंड रूटर से जुडा होता है, जो एक माइक्रो फिल्टर के जरिए फोन साॅकेट औऱ माइक्रो फिल्टर लाइन को विभाजित करता है, जिसकी वजह से इंटरनेट से कनेक्ट रहते हुए भी टेलीफोन पर बात कर पाते हैं।

 आपके घर से निकल कर फोन लाइन लोकल टेलीफोन एक्सचेंज तक जाती है। उसके बाद वहां से लाइन आपको इंटरनेट की सेवा देने वाले सर्विस प्रोवाइडर यानी आईएसपी के सर्वर तक जाती है और वहां से बाकी इटंरनेट में। जिस फाइबर आँप्टिक केबल की ऊपर बात हुई है, उसका जाल महादेशों में फैला है। 



ये केबल प्रति सेकेंड ट्रिलियन्स बिट डाटा ट्रांसमिट करते है इस नेटवर्क का एक हिस्सा अंतरिक्ष में मंडरा रहे सेटेलाइट भी है हर समय आपका कंप्यूटर बेहद शाक्तिशाली सर्वर की ओर में मुहैया कराए जा रहे पेजेज को देखता रहता है। जब भी आप किसी वेबसाइट का एड्रेस टाइप का एंटर करते है तो उस वेबसाइट की ओर से सारी जानकारी सर्वर को भेजी जाती है, जहां से वह आपके कंप्यूटर तक आती है।


अब सवाल है कि जब आफ कोई एड्रेस टाइप करते हैं तो नेट सेवा देने वाले को कैसे पता चलता है कि आपके द्वारा टाइप किया गया एड्रैस कहां से मिलेगा औऱ कैसे वेबसाइट आपके सिस्टम पर डिस्प्ले होगी? इसका जवाब इंटरनेट प्रोटोकाॅल एड्रेस यानी आईपी एड्रेस है। इंटरनेट से जुडे हर कंप्यूटर का एक आईपी एड्रैस होता है। ये असल में एक नंबर होते है औऱ हर नंबर एक दूसरे से अलग होता है, जैसे टेलीफोन के नंबर्स होते है। जैसे 128.130.201.175 किसी कंप्यूटर का नंबर हो सकता है। चूॅकि ये नंबर याद रखना मुश्किल होता है, इसलिए यूजर्स की सुविधा के लिए वेबसाइट का अलग एड्रेस होता है, जिसे डोमेन नेम सिस्टम (DNS)  कहते है जैसे www.questionexam.com लेकिन इसका आईपी एड्रेस औऱ कुछ हो सकता है। अगर आप अपने ब्राउजर के एडैस बार में सीधे यह नंबर टाइप करेंगे, 


इंटरनेट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल ईमेल के लिए किया जाता है। हर सेकेंड लाखो लोग ईमेल भेजते या रिसीव करते हैं। जिस तरह से पारंपरिक चिट्ठियों पर पता लिखा होता था, वैसे ही ईमेल के भी पते होते हैं। ईमेल एड्रैस के दो हिस्से होते हैं और ये दोनो हिस्से एट द रेट (@) से जु़डे होते हैं @ से पहले का हिस्सा लेकिन होता है। यानी किसी व्यक्ति या कंपनी का अपना नाम या उसके द्वारा तय किया नाम होता है। @ दूसरा हिस्सा डोमेन का होता है। जब भी आप कोई ईमेल भेजते हैं तो वह सबसे पहले सर्वर पर जाता। फिर सर्वर ईमेल एड्रैस के डोमेन वाले हिस्से को देखता है औऱ फिर जिसे आफ भेज रहे है उसका आईपी ये सारी सूचनाएं डोमेन नेम रजिस्ट्री में सुरक्षित रखी होती है।



 जब आपका भेजा हुआ मैसेज रही सर्वर में पहुंच जाता है तब वह ईमेल एड्रैस के लोकल हिस्से को ड्राप करता है। यह पूरी प्रक्रिया बिल्कुल पारंपरिक डाकखाने वाली है। आप जब चिट्ठी भेजते है तो वह लोकल डाकखाने में जाती है, फिर वहां से बड़े डाकखाने में जाती है, वहां से उसके गंत्वय वाले बड़े डाकखाने में जाती है, फिर वहां के लोकल डाकखाने में और अंत में जिसके पास भेजी गई होती है, उसके पास। फर्क सिर्फ तकनीक का है।

अंत में आपको यह भी बता दे कि आफके द्वारा भेजा गया मैसेज कैसे सफर करता है। जब आप कोई ईमेल भेजते है, तो वह आपके भेजते ही कई हिस्सों में बंट जाता है। इसके छोटे-2 कई पैकेट बन जाते है। हर पैकेट में कुछ डाटा होता है औऱ इमेबेडेड डेस्टिनेशन एड्रैस होता है। ये सैकेड़ो पैकेट एक साथ लेकिन स्वतंत्र रूप से इंटरनेट में सफर करते हैं। 


ये पैकेट इंटरनेट पर अलग-2 रास्ता भी पकडड सकते है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, सब एक साथ सर्वर कंप्यूटर पर पहुंचते हैं। इसलिए कहा जाता है कि आप जब कंप्यूटर स्विच आँफ करते है तो सिर्फ फिजिकली मशीन को बंद करते है आपका इंटरनेट तब भी चालू होता है औऱ आपका भेजा हुआ या आपके लिए भेजा हुआ मैसेज सफर कर रहा होता है। 

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